यहां छत्तीसगढ़ प्रदेश की सभी छत्तीसगढ़ जनजातियों (Chhattisgarh Tribes) की अपनी अनूठी जीवन शैली, रीति-रिवाजों और पारंपरिक मान्यताओं के बारे में जानकारी दी गई है। जिसमें भारत में कई प्रकार के आदिवासी (Tribal) है और छत्तीसगढ़ उनमें से एक बाहुल्य आदिवासी राज्य (CG Tribal State) है।
यह मानना जाता है की छत्तीसगढ़ राज्य में भारत के सबसे पुराने आदिवासी समुदाय 10,000 वर्षों से बस्तर में रह रहे है। भारतीय संविधान की पांचवी अनुसूची व्यवस्था अनुसार छत्तीसगढ़ में कुल 42 अनुसूचित जनजातियां पायी जाती है।
जिसमें गोंड जनजाति प्रमुख जनजाति है। छत्तीसगढ़ में 5 जनजातियों को विशेष पिछड़ी जनजाति समूहों के रूप में पहचान मिली है।

छत्तीसगढ़ की जनजातियां (Chhattisgarh Tribes (Tribal))
विषय
ब्रिटिश मूल के भारतीय मानवविज्ञानी डॉ वेरियर एल्विन ने छत्तीसगढ़ की मुड़िया जनजाति पर ‘द मुड़िया एण्ड देयर घोटुल‘ की रचना किया। साथ ही, जाॅर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने गौंड जनजाति समूह आधारित पुस्तक ‘गोंडस ऑफ बस्तर‘ लिखी है।
छत्तीसगढ़ के मुख्य जनजातियों का नाम एवं मूल निवास क्षेत्र (जिला) निम्न हैं:-
| जिला (मूल निवास) | जनजाति नाम |
|---|---|
| बस्तर | गोंड, अबुझमारिया, बिसनहोर मारिया, मुरिया, हल्बा, भतरा, परजा, धुर्वा व अन्य |
| दंतेवाड़ा | मुरिया, डंडामी मरिया या गोंड, डोरला, हल्बा व अन्य |
| कोरिया | कोल, गोंड, भुंजिया व अन्य |
| कोरबा | कोरवा, गोंड, राजगोंड, कावर, भैयाना, बिंझवार, धनवार व अन्य |
| बिलासपुर व रायपुर | पारगी, सावरा, मांजी, भयना व अन्य |
| गरियाबंद, मैनपुर, धूरा, धमतरी | कमर व अन्य |
| सुरगुजा व जशपुर | मुंडा व अन्य |
छत्तीसगढ की जनजातियों में प्रत्येक का विशिष्ट इतिहास और संस्कृति, संगीत, नृत्य, पोशाक होता है।
विशेष पिछड़ी जनजातियाँ
केंद्र सरकार द्वारा घोषित (5 जनजातियाँ):
- अबुझमाड़िया: यह जनजाति नारायणपुर जिले में सर्वाधिक पाई जाती है। इनमें ‘करसाड़ नृत्य’ लोकप्रिय है, जिसमें ‘अकुम’ नामक एक विशेष तुरही बजती है। मृत्यु के अवसर पर ये ‘आनाल पाटा’ नामक शोक गीत गाते है।
- बैगा: यह जनजाति मुख्य रूप से सरगुजा, बिलासपुर और राजनांदगांव में निवास करती है।
- ये ‘साल वृक्ष’ को पूज्यनीय मानकर उसकी पूजा करते है। इनके प्रमुख देवता ‘ठाकुर देव’ है।
- इनमें ‘गुदना कला’ लोकप्रिय है।
- इनका प्रमुख पर्व ‘रसनवा’ है और इनका मिलन गीत ‘दशहरा’ या ‘बिलमा गीत’ है।
- विवाह के समय बारात की अगवानी में ‘परघोनी नृत्य’ किया जाता है। आंगन में हाथी बनकर नृत्य किया जाता है।
- इनमें प्रचलित विवाह को ‘पैतुल’ कहते है, जिसे ‘पैढू’ भी कहा जाता है। अगरिया जनजाति में ‘ढूकू’ कहा जाता है।
- बैगा जनजाति में ‘गुदना कला’ लोकप्रिय होती है।
- कमार: यह जनजाति मुख्य रूप से बिंद्रानवागढ़, मैनपुर और फिंगेश्वर में निवास करती है। गरियाबंद जिले का बिन्द्रानवागढ़ तहसील इनका प्रधान क्षेत्र है।
- ये अपने पूर्वज ‘कौरवों’ को मानते है और सैन्य सेवा को अपना पैतृक व्यवसाय मानते है।
- इनकी स्थानांतरित कृषि को ‘दाही’ या ‘दहिया’ कहा जाता है।
- ये सिर के बालों को पवित्र मानते है।
- समुदाय के प्रमुख व्यक्ति को ‘कुरहा’ कहते है।
- पहाड़ी कोरवा: यह कोरवा जनजाति का एक हिस्सा है।
- बिरहोर: यह जनजाति मुख्य रूप से रायगढ़ जिले में पाई जाती है।
राज्य सरकार द्वारा घोषित (2 जनजातियाँ):
- भुजिया: यह जनजाति मुख्य रूप से रायपुर/गरियाबंद जिले में निवास करती है। गरियाबंद जिले का बिन्द्रानवागढ़ तहसील इनका प्रधान क्षेत्र है। यह एक द्रविड़ियन जनजाति है जिसकी दो उपजातियाँ ‘छिदा भुजिया’ और ‘चौखटिया भुजिया’ है।
- पंडो: यह जनजाति सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर और बिलासपुर में पाई जाती है।
अन्य प्रमुख जनजातियाँ
गोंड जनजाति
- यह जनजाति द्रविण भाषा परिवार से है।
- छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक आदिवासी क्षेत्र ‘गोंड़’ प्रजाति के है।
- ये स्वयं को ‘कोयतोर’ या ‘कोया’ के रूप में जानते है।
- इनमें ‘दूध लौटावा’ और ‘लमसेना विवाह’ प्रथा प्रचलित है। सेवा-विवाह-प्रथा भी प्रचलित है।
- ‘मेघनाथ पर्व’ गोंड जनजाति द्वारा मनाया जाता है।
- टोकरियां बनाना ‘धोटयाल गौंड’ का प्रमुख कार्य है।
- गोंड जनजाति में ‘लमसेना विवाह‘ प्रचलित है।
- ‘द मुरिया गोंड ऑफ बस्तर‘ किताब ‘डब्ल्यू. व्ही. ग्रिर्यसन’ द्वारा लिखी गई एवं 1938 में प्रकाशित हुई थी।
- लोहा गलाने का व्यवसाय/कार्य करने वाली ‘अगहिया जनजाति‘ होती है। यह छोटी द्रविड़ जाति एवं गोंड जनजाति का वंश माने जाते है।
मुरिया/माड़िया जनजाति
- मुरिया:
- इनमें ‘घोटुल संस्कृति’ का प्रचलन है। घोटुल के संस्थापक और प्रमुख देवता ‘लिंगोपेन’ है।
- युवा लड़कों को ‘चेलिक’ और लड़कियों को ‘मोटियारी’ कहते है।
- इनका प्रसिद्ध गीत ‘रेला गीत’ है और प्रसिद्ध लोकनाट्य ‘माओपाटा’ है।
- “द मूरियास एंड देयर घोटुल” बेरियर एल्विन द्वारा लिखी गई किताब है।
- माड़िया:
- ये मृत्यु के बाद स्मृति में ‘मृतक स्तंभ’ का प्रयोग करते है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गुड़ी’ कहा जाता है।
- नृत्य के समय जंगली भैंस के सींग से बनी टोपी पहनते है।
- ‘सल्फी’ नामक पेय पदार्थ इनमें अत्यधिक लोकप्रिय है।
- इनमें ‘भगेली विवाह’ प्रचलित है।
- दंडामी माड़िया: इनमें ‘गौर नृत्य’ प्रसिद्ध है।
- हिल माड़िया: इनकी स्थानांतरित कृषि को ‘पेद्दा’ कहा जाता है।
- मुड़िया-माड़िया: ये जनजातियाँ लकड़ी के खुदाई कार्य में प्रवीण मानी जाती है।
- माड़िया जनजाति के स्त्री पुरूष का मिलन स्थान को ‘सिहारी झोपड़ी‘ कहा जाता है।
हल्बा जनजाति
- यह आर्थिक दृष्टि से सबसे विकसित जनजाति है।
- इनका निवास क्षेत्र दुर्ग, रायपुर एवं बस्तर है। इनकी एक विशेष शाखा ‘नागबंसी बलबा’ दंतेवाड़ा व नारायणपुर में सीमित है।
- ये स्वयं को ‘महादेव एवं पार्वती’ द्वारा उत्पन्न मानते है।
- इन्होंने सर्वाधिक रूप से ‘कबीर पंथ’ को अपनाया है।
- इनमें गणचिह्नवाद या टोटम प्रथा (Totemism) को ‘बरग’ या ‘बरगी’ कहा जाता है।
- इनका मुख्य जीविकोपार्जन कृषि है और ‘सैला नृत्य’ अत्यधिक लोकप्रिय है।
- ब्रिटिशकाल में ‘हल्बी’ भाषा बस्तर राज्य की सरकारी बोली थी।
- छूआछूत पर विश्वास रखने वाली जनजाति ‘हल्बा जनजाति’ है।
- हल्बा व भतरा प्रजाति में पाली ‘परब पर्व‘ विशेष लोकप्रिय है।
उरांव जनजाति
- इनका मूल स्थल दक्कन का क्षेत्र माना जाता है।
- इनके युवागृह को ‘धुमकुरिया’ कहा जाता है। जिसके वयस्क सदस्यों को ‘धांगर‘ कहा जाता है।
- इनकी प्रमुख भाषा ‘कुरुख’ या ‘कुडुख’ है और पारंपरिक पोशाक ‘करेया’ कहलाता है।
- ये चैत्र मास की पूर्णिमा में ‘सरहुल नृत्य’ करते है। यह नृत्य साल वृक्ष के समीप किया जाता है।
- इनके अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है।
- इनकी एक उपजाति का नाम ‘धनका’ है।
- छ.ग. के उरांव जनजाति के लोग अपने संतान का नाम पशु-पक्षियों, वृक्षों के नाम पर रखते है।
- उरांव जनजाति के लोग स्वयं को कौरव के वंशज मानते है।
- उरांव जनजाति की उप जाति का नाम ‘धनका‘ है।
कोरवा जनजाति
- यह मुख्यतः रायगढ़, जशपुर, सरगुजा जिले में निवास करती है।
- इनका नृत्य ‘भयोत्पादक’ होता है और लोकप्रिय पेय ‘हंडिया मदिरा’ है।
- इनकी पंचायत को ‘मैयारी’ कहा जाता है।
- इनमें हठ विवाह को ‘ठुकू विवाह’ कहा जाता है।
- ‘डिहारी कोरवा’ पिछड़ी जनजातियों में शामिल नहीं है।
- ये कुटकी व गोंदली फसल काटने पर ‘कोरा उत्सव’ और ‘धेरसा उत्सव’ मनाते है।
- कोरवा जनजाति में ‘डिहारी कोरवा’ पिछड़ी जनजातियों (CG Tribal List) में शामिल नहीं है।
कोरकू जनजाति
- द्रविड़ भाषा ‘कोरक’ शब्द का अर्थ ‘किनारा’ होता है, ये नर्मदा और ताप्ती नदी के किनारे रहते है।
- इनमें ‘खम्भ स्वांग’ प्रथा प्रसिद्ध है।
- इनका प्रमुख देव ‘सिंगरी देव’ है और मृत्यु संस्कार को ‘नवाधानी’ कहा जाता है।
- इनका पारंपरिक लोकप्रिय नृत्य ‘भापटी नृत्य’ है।
- कोरकू जनजाति को ‘अरन्धा‘ कहा जाता है।
कंवर जनजाति
- इनके प्रमुख चेरवा, राठिया, तंवर एवं चत्री है।
- महान समाज सेवक ‘गाहिरा गुरू’ इसी जनजाति के थे। 1953 में ‘सतनाम धर्म संत समाज‘ की स्थापना की थी।
- इनमें ‘बार नाच’, ‘बार त्यौहार’ और ‘बार नृत्य’ प्रचलित है।
भतरा जनजाति
- यह सामाजिक दृष्टि से सर्वोच्च स्थान रखती है।
- इनका निवास क्षेत्र बस्तर जिला है, जो उड़ीसा की सीमा से लगा है।
- इनका विस्तार काकतीय नरेश अन्नदेव के साथ वारंगल से बस्तर तक माना जाता है।
- इनमें ‘पाली परब पर्व’ विशेष लोकप्रिय है।
धुरवा (परजा) जनजाति
- धुरवा जनजाति को ‘परजा’ भी कहा जाता है।
- इनका प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य ‘परब नृत्य’ है, जिसे सैनिक लोक नृत्य भी कहते है।
- ये पशु-पक्षियों की मुद्राएं बनाकर नृत्य करते है।
- बस्तर संभाग में ‘आमाखायी पर्व’ इनमें विशेष लोकप्रिय है।
- बस्तर जिले की विशेष जनजाति का नाम ‘परजा‘ है।
अन्य जनजातियों से संबंधित बिंदु
- अगरिया: इनमें ‘उड़द दाल’ का विशेष महत्व है। ये लोहा गलाने का व्यवसाय करते है।
- भारिया: इनकी मूल बोली ‘भरनोटी’ या ‘भरियाटी’ है। इनमें ‘बिंदरी’, ‘नवाखाई’ और ‘जवांरा’ पर्व होते है। ‘मंगनी विवाह’, ‘राजी बाजी विवाह’ प्रचलित है।
- नगेशिया: ये रायगढ़, सरगुजा जिले में निवास करते है और ‘साहनी गुरू’ व ‘गाहिरा गुरू’ से प्रभावित माने जाते है।
- बिंझवार: ये बिलासपुर व बलौदा बाजार में निवास करते है। इनका प्रतीक चिन्ह ‘तीर’ है और इनमें ‘तीर विवाह’ प्रचलित है। अनेक राजाओं के साथ वर्णन है एवं उनका उल्लेख दंतकथाओं में मिलता है।
- धनवार: ये बिलासपुर जिले में निवास करते है और धनुष-तीर का प्रतीक होते है। मध्य प्रदेश में धनुवर के नाम से भी जाना जाता है।
- खैरवार: ये कत्था का व्यवसाय करने वाली प्रमुख जनजाति है। उपजातियों का नाम प्राणियों व पौधों के नाम पर रखा जाता है।
- कोल: यह जनजाति कोरिया जिले में पाई जाती है और इनमें ‘कोल दहका नृत्य’ व ‘कोलहाई नाच’ प्रचलित है।
- मंझवार: यह जनजाति कटघोरा क्षेत्र में निवास करती है।
- पारधी: ‘आखेट’ (शिकार) इनकी आजीविका का परंपरागत स्रोत है।
- खड़िया: इनका मुख्य कार्य पालकी ढोना था और इनके प्रमुख देवता ‘बंदा’ है।
- कोया: यह जनजाति बस्तर के गोदावरी अंचल में निवास करती है और स्वयं को ‘दोरला’ या ‘कोयतूर’ भी कहती है।
- सौंता: यह जनजाति कोरबा जिले के कटघोरा तहसील में पाई जाती है।
- भैना: यह जनजाति बिलासपुर व जांजगीर-चांपा जिले में पाई जाती है।
- मुण्डा: इनका निवास बस्तर की जगदलपुर तहसील तक सीमित है। ये बस्तर राजवंश के पारंपरिक गायक माने जाते है।
छत्तीसगढ़ की जनजातियां संबंधी जानकारी (One Liner CG Tribes Information)
छत्तीसगढ़ जनजाति/आदिवासी संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी – Most Important Chhattisgarh Tribes One liner Information in Hindi निम्नानुसार है;-
- छत्तीसगढ़ में बाहुल्य जनजाति क्षेत्र में ‘5वी अनुसूची’ व्यवस्था लागू की जाती है।
- छत्तीसगढ़ में केन्द्र शासन द्वारा घोषित विशेष पिछड़ी जनजातियों की कुल संख्या 5 है।
- छत्तीसगढ के 5 विशेष पिछड़ी जनजातियों का नाम- ‘अबुझमाड़िया’, ‘बैगा’, ‘कमार’, ‘पहाड़ी कोरवा’ व ‘बिरहोर’ है।
- छत्तीसगढ़ में राज्य शासन द्वारा घोषित विशेष पिछड़ी जनजातियों की कुल संख्या 2 है।
- छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा घोषित 2 विशेष पिछड़ी जनजातियां का नाम- ‘भुजिया’ एवं ‘पंडो’ है।
- छ.ग. में घोषित अनुसूचित जनजाति समूह की कुल संख्या 42 है।
- छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक आदिवासी क्षेत्र ‘गोंड़’ प्रजाति के है।
- छत्तीसगढ़ में आर्थिक दृष्टि से सबसे विकसित जनजाति ‘हल्बा‘ जनजाति (Halba CG Tribal) है।
- पैसा/धन देकर वधू प्राप्त करने की पारंपरिक प्रथा ‘पारिंग धन‘ कहलाता है।
- छत्तीसगढ़ की आदिवासी समाज में एक पति त्याग कर दूसरा पति रखना ‘ठुकूप्रथा‘ कहलाता है।
- आदिवासियों का सबसे प्रमुख देव ‘बुढ़ादेव‘ को माना जाता है।
- आदिवासी जनजाति समूह में गुण्डाधूर आदिवासी ‘नायक’ चमत्कारिक पुरूष के रूप में जाना जाता है।
- अन्य जनजातियों में विधवा स्त्री से अल्प व्यय में विवाह –‘अर-उतो विवाह‘ प्रचलित है।
- जनजातियों का प्रचलित स्थानातंरित कृषि या झूम कृषि (Slash and Burn Farming) को –‘बेवर या पेंदा कृषि/ पैंडा कृषि‘ कहलाता है।
- छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक जनजाति प्रतिशत वाला जिला- ‘नारायणपुर जिला’ है।
- भारत में सर्वाधिक जनजाति वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ राज्य का चौथा (4) स्थान है।
- छत्तीसगढ़ में सबसे कम जनजाति प्रतिशत वाला जिला- ‘रायपुर जिला’ है।
- जनजातियों का पूजा स्थान, जहां देव स्थल होता है, ‘सरना’ कहलाता है।
- ‘द मूरियास एंड देयर घोटुल‘ किताब ‘बेरियर एल्विन’ द्वारा लिखी गई एवं लंदन में 1947 को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, लंदन द्वारा प्रकाशित किया गया।
- बस्तर के प्रमुख जनजाति देवता ‘डाक्टर देव‘ को कहा जाता है।
- बेलदार अनुसूचित जाति वर्ग की जाति में शामिल है।
- भील जनजाति मूख्यतः छत्तीसगढ़ राज्य में नहीं पायी जाती है।
- ‘पटरिया’ परधान जनजाति के लोगों को कहा जाता है।
- करमा नृत्य जनजातियों का सर्वाधिक प्रसिद्ध लोक नृत्य है।
- ‘बंदा‘ खरिया जनजाति वर्ग का प्रमुख देवता (CG Tribal God) है।
- कोंडागांव की प्रमुख जनजाति देवी ‘दाबागोलिन‘ देवी को माना जाता है।
- पन्धी जनजाति, सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर व बिलासपुर में पायी जाती है।
- छत्तीसगढ़ में बिरसा मुंडा सरगुजा जिले के निवासी माने जाते है।
- धनकुल जनजाति क्षेत्र में प्रचलित एक पारंपरिक अनूठा अद्वितीय मौलिक वाद्य यंत्र है।
- छेरछेरा त्यौहार में जनजाति युवकों द्वारा ‘छेरता गीत‘ गाया जाता है एवं नवयुवतियों द्वारा ‘तारा गीत‘ गाया जाता है।
- आनाल पाटा, वह शोक गीत जो बस्तर संभाग के अबूझमाड़िया, मुरिया, डंडामी माड़िया व दोरला जनजाति द्वारा मृत्यु के अवसर पर गाया जाता है।
- ‘धरती मोर परान‘ गेंदराम सागर जनजातिय शिल्पकार की कृति है।
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1953 में कंवर समाज के गाहिरा गुरू द्वारा ‘सतनाम धर्म संत समाज‘ की स्थापना की थी…इसके बारे में पूरा डीटेल चाहिए सर क्या मिल पाएगा
सर आप chattisgarh के सभी जनजाति के G k को 1 साथ मिक्स कर dete hai,, aap se please requests hai की
Aap jab bhi Koi जनजाति य other के gk बनाये तो,
1 hi जनजाति या other के topic was Gk बनाये..
जैसे जनजाति मे –1गोड, का एक जगह, रहे सभी नृत्य, बोली, देवी-देवता, ,,,,, आदि
इससे समझने मे थोड़ी बहुत आसान, सरलता, सहज मिलती है
परीक्षा में याद, रहता है,,,,,,, 🤔🤔🙏🙏🙏💫
क्या आप जानकारी दे सकते हैं कि धानका जनजाति जिसे उरांव जनजाति की उपजाति कहा जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य में सिर्फ धानका जनजाति की जनसंख्या कितनी है और छत्तीसगढ़ राज्य में किस किस जिले में धानका जनजाति की जनसंख्या है।